” लाचारी “

चहुं ओर हाहाकार देख

मस्तिष्क में विचार ही नहीं आते ,

कुछ पंक्तियां लिखने को

उठे हाथ हैं कंपकंपाते ,

ओक्सीजन और हस्पताल की चीख-पुकार से ,

अंदर ही अंदर सब सहम जाते

डाक्टर की लाचारी देख

दिल के सैंकड़ों टुकड़े हो जाते,

बस…..

उम्मीद से भरी आंखें देख

हौंसले का हाथ ही बढ़ा पाते ,

शून्य में तकते नयन

अविरल अश्रु हैं बहाते ।।

” Good For Nothing “

If I can’t do any piece of work in time
I am good for nothing ,
If I can’t do the household chores precise
I am good for nothing ,
If I can’t drive to perfection
I am good for nothing ,
If I argue and oppose
I’am good for nothing ,
God damn why this hypocrisy ??
I am who I am
And most importantly
I am happy in whatever I do
I don’t need your judgement to see through …

” विचारों की लस्सी “

Facebook, Insta और Twitter ने
ले रखी है जान ,
ना चाहते हुए भी जाता है बार-बार
इन पर ध्यान ,
हम भी हो जाते हैं fussy ,
और बनने लग जाती है विचारों की लस्सी ।

Beauty और fashion वीडियो देखकर ,
बढ़ जाता है depression ,
Inner beauty से टूट सा जाता है connection ,
दूसरों की figure तो लगे पतली रेशम की तार जैसी ,
अपनी body लगने लगती है मोटी jute की रस्सी ,
और बनने लग जाती है विचारों की लस्सी ।

Cooking videos भी कम क़हर नहीं ढा़ती हैं,
नई-नई dishes बनाने को नियत ललचा जाती है ,
Grocery की list बढ़ती ही चली जाती है ,
Wallet की economy भी बिगड़ सी जाती है ,
Dish ठीक ना बनने पर जब
घरवाले रोक नहीं पाते अपनी हँसी ,
फिर बनने लग जाती है विचारों की लस्सी ।

हद तो तब हो जाती है घनघोर ,
जब लोगों के weekend trips का दिखता है शोर ,
उनकी मस्तीभरी pics देख – देख कर
अपना जीवन लगने लगता है बोर ,
उमड़ – घुमड़ के चहुं ओर से
इच्छाएं कर देती हैं हमें mussy ,
और बनने लग जाती है विचारों की लस्सी ।

ऐसे भयंकर विचार आएंगे तो हम कहां जाएंगे ?
इतनी लस्सी बना – बना के mind की बत्ती ही बुझाएंगे ,
जो मिला है उसी में अगर सुख पाएंगे
तब ही तो peacefuly जी पाएंगे ।

” आस “

क्या है आस ?
अपनों से अपनत्व का विश्वास
ही जगाता है मन में आस ।

दोस्त से दोस्ती निभाने की आस ,
पति पत्नी में प्रेम की आस ,
माता-पिता से विश्वास की आस ,
ससुराल पक्ष में सम्मान की आस ,
अनकहे रिश्तो में एक मिठास की आस ,
वैचारिक मतभेद होते हुए भी समझने की आस ,
भारत भूमि के सपूतों से भारत माता के सम्मान की आस ,
छिन्न-भिन्न होती दिखे जब भी कोई आस ,

फिर,

अकेलेपन का होने लगता है आभास ,
जब रिश्ते फिरने लगे बदहवास ,
अपनों के विचार ही लगे बकवास ,
सुखमय संबंध भरने लगे ह्रदय में खटास ,
विद्रोह करता है मस्तिष्क और रुंध जाती है हर एक श्वास ,
फिर टूट जाती है जीवन जीने की हर एक आस ।

” Insensitive people “

Why people change their behaviour
According to their necessasity ?
In this oppurtunist world
Why nobody respect someone’s generosity ?
Why diligent people are asked
To prove their ability ?
Why people manoeuvre
Someone’s proximity ?
Why people fake
And hide their atrocity ?
Why people can’t
Value someone’s precocity ?
Why people deamanize
Someone’s virtuosity ?
When such people meet
Any influential personality
They materialize their relations
And shift their priority .

But ,

They don’t know
Kind and innocent people
Can feel their crotchety .
As wise people always
Disregard such animosity .

” कानों को चैन “

जो बेचारे कान ,
2020 में थे बहुत परेशान ,
चश्मे की डंडी और मास्क की डोरी से ,
निकल सी रही थी जिनकी जान ,
जो उलझन में थे घमासान ,
शायद उन कानों को 2021 में आए चैन ,
हो जाए खत्म शायद उनका बैन ।

तरस रहे थे जो बेचारे ,
खुसर – फुसर की आवाजों को ,
सहेलियों के झुंड के ठहाकों को ,
यारों की बेबाक बातों को ,
वर्क फ्रॉम होम के कारण
बॉस की गरम – गरम झिकझिक को ,
रिश्तेदारों की बेवजह चिक-चिक को ,
शायद उन कानों को 2021 में आए चैन ,
हो जाए खत्म शायद उनका बैन ।

बस इन बेचारे कानों की यही है फरियाद ,
2020 की खट्टी – मीठी यादों को
करते रहना याद ,
थोड़े में ही अब खुश रहना
किसी की अहमियत फिर मत भूलना ,
2021 के बाद ,
भूल ना जाना पड़ोसियों से सौहार्द ,
प्रकृति के महत्व को ,
आपसी अपनत्व को ,
झेल लेंगे हम आगे भी
चश्मे और मास्क की उलझन ,
प्रेम की महक को वैसे ही बरकरार रखना
जैसे महकता है फूलों भरा उपवन ,
तभी आएगा हम बेचारे कानों को चैन ,
हो जाए खत्म शायद हमारा बैन ।।

” दिमाग “

दिमाग….

शरीर रूपी मशीन का एक अहम पुर्जा़ ,
जो भरता है अंग – प्रत्यंग में ऊर्जा ।
बैठाता सभी अंगो का आपस में तालमेल ,
पर दिल सदा ही खेल बैठता है इससे खेल ।
दिमाग विचार – शक्ति को बनाता है मजबूत ,
दिल हो जाता है भावनाओं के वशीभूत ।
ना जाने दिल से अलग दिमाग के रस्ते क्यों हैं ,
दिमाग ही तो बताता है कि आज के रिश्ते सस्ते क्यों है ।
यही तो देता है सही मार्गदर्शन ,
दिल बीच में घुसकर बढ़ा देता है उलझन ।
चलो इन सभी उलझनों को सुलझाते हैं ,
दिल और दिमाग की जंग में दिमाग को जिताते हैं ,

क्योंकि ,

दुनिया में दिल की बात कोई सुनता नहीं है ,
प्यार के बंधन अब कोई बुनता नहीं है ।
हम जैसे चंद लोग दिल लगाकर दगा़ खा जाते हैं ,
उन्हीं लोगों के दिमाग हमारे दिल को चबा जाते हैं ।

इसलिए दोस्तों ,

दिमाग की हर बात को
दिल से अपना लेना चाहिए ,
जो जिस भाषा में समझे
उसे उसी भाषा में जवाब देना चाहिए ।

” मतलब की दोस्ती “

कुछ सालों पहले क्या कभी हमने ” मतलब की दोस्ती ” जैसा शब्द सुना था ? यह आधुनिक समाज की देन है । लोग हर रिश्ते के मूल आधार को पीछे छोड़ते आ रहे हैं फिर चाहे वह कोई पारिवारिक रिश्ता हो या दोस्ती का । वह जमाना और था जब ” सुदामा और श्रीकृष्ण ” जैसे मित्र हुआ करते थे ।

दोस्ती एक आत्मिक रिश्ता हुआ करता था परंतु आज लोग व्यवहारिक रिश्ते बनाना पसंद करते हैं । यह तो हम कब से सुनते आ रहे हैं कि एक शिशु अपने साथ काफी रिश्ते लेकर जन्म लेता है परंतु मित्रता ही केवल एक ऐसा रिश्ता है जो वह स्वयं बनाता है । दोस्त हर आयु में बदलते जाते हैं परंतु वह लोग भाग्यशाली होते हैं जिनके दोस्त बचपन से लेकर वृद्धावस्था तक साथ रहते हैं । आज के इस आधुनिक युग में ऐसे दोस्त मिलना असंभव सा प्रतीत होता है । आजकल दोस्ती इंसान के व्यक्तित्व से नहीं उसके पद , प्रतिष्ठा और समाज में पैंठ से होती है । जिसको जिस से जितना फायदा मिलता है वह प्रतिष्ठित व्यक्ति का उतना ही घनिष्ट मित्र बन जाता है और दोस्ती निभाने के अनेक दावे करता है परंतु मतलब निकलने के बाद सारे दोस्ती के दावे धरे के धरे रह जाते हैं और दिल से सोचने वाले भावुक व्यक्ति अपना दिल दुखा बैठते हैं क्योंकि यह अपने भोलेपन में सामने वाले का दोस्ती का मुखौटा पहचान नहीं पाते । अधिकांश लोग आज अपना काम निकलवाने के लिए या समाज में अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए किसी ऐसे व्यक्ति से दोस्ती करते हैं जिससे उन्हें यह सब प्राप्त हो जाए । आज किसी के कंधों पर पैर रखकर ऊपर चढ़ने वालों की संख्या काफी अधिक हो गई है । व्यक्ति किसी की सद्भावना और प्रेम को अनदेखा कर आगे बढ़ जाता है और मजे की बात यह है कि जिस के कंधों पर सवारी की जा रही हैं वह समझ ही नहीं पाता और खुशी – खुशी अपने दोस्त का सहारा बन जाता है । किसी ने क्या खूब कहा है ,

“”मतलबी दुनिया का बस इतना सा फ़साना है ,

आज तेरा दिन है तो तुझे अपना दोस्त बनाना है ।””

जब तक आप किसी के समक्ष रहते हो तब तक आपको पूछा जाता है यदि आप आंखों से ओझल हो जाओ तो आपके तथाकथित दोस्तों का रवैया भी बदल जाता है । यह आज का कटु सत्य है । दोस्ती एक प्यारा बंधन ना रहकर व्यापार बन गई है और हर व्यापारी खुद को सामने वाले से बड़ा बनाने की होड़ में लगा हुआ है । कोमल हृदय वाले लोग यह सत्य पचा नहीं पाते और इसी कशमकश में रहते हैं कि मैंने ऐसा क्या कर दिया , मुझसे क्या गलती हुई ! गलती उनकी नहीं , उनके प्रेम कि नहीं , उनके अपनत्व कि नहीं अपितु गलती है सामने वाले की जिसने उनका आत्मिक स्नेह नहीं देखा । देखा तो केवल अपना फायदा , अपना मतलब । भावुक लोगों से मैं इतना ही कहना चाहूंगी कि समय आ गया है कि हम खुद को बदलें वरना जिंदगी भर इस्तेमाल होकर फैंके जाएंगे ।

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