“डर लगता है”

अंधेरा हमसाया है मेरा ,
उजाले से अब डर लगता है ।
भूख नहीं डराती अब ,
निवाले से ही डर लगता है ।
फूंक – फूंक क्या कदम रखूं ,
चलने से ही डर लगता है ।
चोरों से क्या डरना अब ,
रख वालों से डर लगता है ।
धोखे , वफा की क्या चर्चा करूं ,
किसी के साथ से डर लगता है ।
फटकार से क्या डरना यारों ,
प्यार से अब तो डर लगता है ।
बेगानों को क्या दोष देना ,
अपनों से ही डर लगता है ।
किस्मत को क्या कोसूं अब ,
सुख – सुविधा से डर लगता है ।
बद्दुआ कोई क्या देगा ,
दुआओं से भी डर लगता है ।
राज किसी का भी हो यारों ,
माहौल से ही डर लगता है ।
पंखों की कोई इच्छा नहीं अब ,
उड़ने से ही डर लगता है ।
रिश्तेदारी क्या निभाऊं ,
रिश्तो से अब डर लगता है ।
जगमगाती रोशनी में ,
मन के अंधेरों से डर लगता है ।
अंधेरा हमसाया है मेरा ,
उजालों से अब डर लगता है ।।

Posted byBeingcreativePosted inUncategorizedTags:कविताडर6 Commentson ” डर लगता है “

Published by Beingcreative

A homemaker exploring herself!!

11 thoughts on ““डर लगता है”

  1. जो निभाना पड़े वह रिश्ता हीं क्या? मुझे ये पंक्तियाँ पसंद आई-

    रिश्तेदारी क्या निभाऊं ,
    रिश्तो से अब डर लगता है ।

    Liked by 1 person

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