” Who is a good friend “

Whenever you are thoughtful , concerned , caring and trusting you are a good friend .

Whenever you are eager to share especially someone’s sorrows and joys and generous with the help and time you spend you are a good friend .

Whenever you desire to give all you have you are a good friend .

Whenever you are ready with the word of hope , cheer and fortuitous to listen with patience and try to understand till the end you are a good friend .

Whenever you are loving and there to stand by simeone you are a good friend.

Whenever you try to mend a broken bond you are a good friend .

” जाने क्यों “

ऐसे भी हमसे क्या कसूर होते हैं ,
जिनसे प्यार हो वही हमसे दूर होते हैं ,
दुनिया से क्यों करें शिकवा अब ,
जाने क्यों झूठे से लगते हैं रिश्ते सब ,
ऐसे भी जाने क्या मजबूरी थी ,
उनकी बेवफाई से हम मशहूर होते हैं ।
हाथ की लकीरों से क्या करें बंदगी ,
पानी सी फिसल रही है जिंदगी ,
ख्वाब जो चमकते थे अशनूर की तरह ,
सारे के सारे ही ‌चकनाचूर होते हैं ,
ऐसी भी हमसे क्या कसूर होते हैं
जिन से प्यार हो वही हमसे दूर होते हैं ।।

“House Help”

Who are house help?

The person who help us in performing our household chores in a better and comfortable way are house help .

Without their support our life would be a clutter . We ladies hold something for them as we know how tiring and demanding there job is but gents are sceptical about their significance . All the time our husbands say that we cosset our maids and overindulge ourselves . During the lockdown gents stint at home doing household chores proved to be a reality check of househelp’s worth . This pandemic made us value each and every person around us and househelp are not exceptions .

They are always on the tools to service but do we repay them in any form other than their salary ?

We should support them emotionaly and financialy by taking good care of their needs and appreciating their craft . They are skilled to mantain our homes to make us comfortable . They don’t wish more except our respect and affection afterall they make our homes cosy to live in . They are worried for our well being like a family member and it’s our duty to treat them as one because

They are somebody’s reason to smile and relax .

” इस्तेमाल “

एक लेखक के मन में सदा ही उथल-पुथल मची रहती है , भावों और विचारों का आवागमन चलता ही रहता है । आज खुद को हम से संबोधित करने की इच्छा जागृत हुई तो ऐसा ही कर रहे हैं ।

यूं तो हम अक्सर अपने जीवन के अनुभव और प्रसंगों से प्रेरित होकर लेख या कविताएं लिखते रहें हैं परंतु आज का विचार हमारा व्यक्तिगत नहीं है अपितु कई लोगों के मन में यह विचार आता होगा कि उन्हें स्वार्थ वश इस्तेमाल किया जाता है । हम आज अपने जीवन के कुछ प्रसंग आपके साथ सांझा करना चाहते हैं ।

कुछ लोग समाज में या यूं कहें संसार में ऐसे हैं जो केवल अपनी ज़रूरत के हिसाब से किसी से संबंध रखते हैं और कुछ लोग हमारे जैसे होते हैं जो यह जानते हुए भी किसी की मदद करते हैं की उन्हें इस्तेमाल किया जा रहा है । ऐसे लोगों को आप क्या कहेंगे ? जो जानते बुझते अपने साथ ऐसा होने देते हैं । आम भाषा में ऐसे लोगों को बेवकूफ कहा जाता है और मुझे प्रसन्नता हो रही है आप सब को यह बता कर कि ” हां हम एक बेवकूफ हैं । ” यह हमारे लिए नकारात्मक संबोधन नहीं है। हम इसे अपनी प्रशंसा मानते हूं । हमें गर्व है इस बात पर । जानिए कैसे !

बचपन से हमें ऐसे दोस्त और बुद्धिजीवी मिले जो केवल अपने मतलब और काम निकलवाने के कारण हमारा इस्तेमाल करने के लिए हमारे समीप आए । अल्पायु में पिता के देहांत के बाद‌ हम और मां अकेले थे , कोई पुत्र ना होने की वजह से मां के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलना हमारा कर्तव्य था जो हम सहर्ष निभा रहे थे । इसी यात्रा में ऐसे बुद्धिजीवियों से हमारा आमना-सामना हुआ । दसवीं कक्षा में हमने गाड़ी चलाना सीख लिया शायद इसी कारण कुछ नए दोस्त बने जो जो हमसे बात भी नहीं करते थे परंतु अब वह कभी हमारे साथ स्कूल जाते कभी बाज़ार और कभी घूमने फिरने और हम ड्राइवर बने उन्हें भ्रमण कराते । नृत्य , गायन और नाटकों में बचपन से ही रुचि होने के कारण युवावस्था में अनेकों बार लोग हमसे इसका ज्ञान प्राप्त करने के लिए रिश्ते बनाने लगे क्योंकि निशुल्क सेवा किसे अच्छी नहीं लगती । हम ठहरे बेवकूफ सब जानते हुए भी लोगों के झांसे में आते रहे और उन्हें संतुष्टि मिलती रही । विवाह उपरांत हम नए क्षेत्र में पहुंच गए और हमारी कलाएं लोगों के समक्ष उभर कर आने लगीं बस फिर क्या था वही सिलसिला फिर से शुरू हो गया । हम यह नहीं कहते की हर कोई हमें इस्तेमाल करने वाला ही मिला , बहुत से रिश्ते ऐसे मिले जो केवल प्यार और व्यवहार से जुड़े थे । जैसे बगिया में विभिन्न प्रकार के फूल होते हैं उसी की भांति समाज में भी नाना प्रकार के व्यक्ति होते हैं । बच्चों को स्कूल छोड़ने जाना या लाना हो , बाज़ार जाना हो या और कोई काम हो तो हम जैसे बेवकूफ दूसरों की सहायता करने से पीछे नहीं हटते । हमारा उद्देश्य केवल यह होता है कि हम तो जा ही रहे हैं तो दूसरे बच्चों को भी साथ बैठा लिया जाए , यदि बाजार जा रहे हैं तो अड़ोस पड़ोस वालों को साथ ले चले जहां हम कुछ खरीदारी करेंगे वहीं दूसरा भी कर लेगा । हम जैसे लोगों की टैक्सी सर्विस सदा चालू ही रहती है और हमें इसमें आनंद मिलता है परंतु विभिन्न लोगों की विचारधारा में ऐसा करके हम महान बनने का प्रयास कर रहे होते हैं । खैर चलिए आगे बढ़ते हैं दिल्ली महा नगरी को छोड़ जब हम पंजाब के एक शहर में परिवार सहित जीवन की नई पारी खेलने पहुंचे तो नए क्षेत्र में नए लोग भी मिले जो हमारे व्यक्तित्व और गुणों से प्रभावित होकर हमें प्रेम करने लगे और कुछ और‌ बुद्धिजीवी मिले जिन्हें हमारी आवश्यकता थी परंतु हम तो हम हैं , बदल थोड़ी सकते हैं खुद को । अनेकों बार खुद को इस्तेमाल होता देख प्रसन्न होते रहे । अब चाहे लोग हमें डिप्लोमेट , पाखंडी , वर्णसंकर आदि अनेक नामों से बुलाएं परंतु हमें पता है हम वही बेवकूफ हैं जो हर समय हर किसी की भी सहायता के लिए तत्पर है । मिथ्या नहीं कहेंगे कि हमें इन बातों से फर्क नहीं पड़ता , अनेक बार मन विचलित हो उठता है अपने लिए यह शब्द सुनकर , शब्दों के दंश तो हमें भी चुभते हैं परंतु यही सोचते हैं कि भगवान ने हमें योग्य समझकर ऐसा हुनर बख्शा है जिससे हम लोगों के काम आ सकें । मन यही सोच कर आह्लादित हो उठता है कि हम किसी के काम तो आ रहे हैं । काम के लिए ही सही कोई हमें याद तो कर रहा है , वरना इस संसार में अधिकतर व्यक्ति ऐसे हैं जिनके अस्तित्व से भी लोग अनभिज्ञ हैं तो उन्हें स्मरण रखना तो बहुत दूर की बात है ।

चेहरे पर मंद मुस्कान आ जाती है जब लोग यह दर्शाते हैं कि वह हमारे शुभचिंतक हैं , उन्हें यह भ्रम रहता है कि वह हमें कितनी सरलता से मूर्ख बना रहे हैं । जीवन के कटु अनुभवों ने हमें मनुष्य को पहचानने की समझ दी है और हम भलीभांति लोगों की मंशा को समझ भी सकते हैं और देख भी सकते हैं परंतु हमें आत्मिक शांति मिलती है लोगों की किसी भी प्रकार से सहायता करने में । आप इसे हमारी उत्पादन त्रुटि या जन्मसिद्ध अधिकार मान सकते हैं क्योंकि हम ऐसे ही हैं ।

तो क्या हुआ अगर हम किसी के उन्नति करने के शिखर पर पग रखने के लिए सीढ़ी बने , तो क्या हुआ अगर हमारे कारण किसी का काम बन गया , तो क्या हुआ जो हमारी वजह से किसी के चेहरे पर मुस्कान खिली । हमारा अस्तित्व किसी के काम तो आया । उनका कर्म उनके साथ और हमारा हमारे साथ ।
कुछ पंक्तियां समाज के हम जैसे तथाकथित बेवकूफ व्यक्तियों के लिए ।

हम खुश हैं,
कि हमारे कारण कईं लोग आगे बढ़े हैं ,
हम खुश हैं ,
की हम किसी ना किसी के लिए आज भी खड़े हैं ,
हम खुश हैं कि हम किसी की ज़रूरत बन सके ,
हम खुश हैं कि हम किसी के साथ चल सके ,
शुक्रिया उस खुदा का जिसने हमें ऐसा बनाया ,
हर किसी को हमने अपने दिल से लगाया ,
जिसको जितनी ज़रूरत थी उसने उतना जाना हमें ,
अपनी सहूलियत के हिसाब से पहचाना हमें ,
हमारे जैसे बेवकूफ अक्सर होते हैं कम ,
जो किसी की मदद के लिए तैयार रहते हैं हरदम ।

“जीने की कला”

मनुष्य को चाहिए सद्भावना जागृत रखना ,
अपने और परायों के दुख का ध्यान रखना ।
जाने कब टूट जाए भ्रम इस जिंदगी का ,
इसलिए हर किसी को अपना बना के रखना ।
अपने प्रेम से लोगों के दिल जीत कर ,
हर किसी को ह्रदय से लगा कर रखना ।
आती है हमेशा बहार के बाद पतझड़ ,
बुरे दिनों के लिए कुछ फूल खिला कर रखना ।
जाने किस भेस में मिल जाए परमात्मा ,
तुम सब के लिए घर - द्वार खुला रखना ।।

“इंतज़ार”

शुष्क रेगिस्तान को पानी की एक बूंद का इंतज़ार ,
खुश्क हुए रिश्तों को प्यार की जलधारा का इंतज़ार ,
अनुर्वर धरती को बरखा की फुहार का इंतज़ार ,
अवसाद से भरे ह्रदय को प्रसन्नता का इंतज़ार ,
एक मां की सूनी कुक्षी को नवजीवन का इंतज़ार ,
बिछड़े मित्र को मित्रता के एहसास का इंतज़ार ,
अबोध कली को उत्फुल्ल होने का इंतज़ार ,
वृद्ध मां बाप को बच्चों के आलिंगन का इंतज़ार ,
दुख‌ की लहरों में गोते खाती नाव को नाविक का इंतज़ार
छोटी-छोटी कोंपलों को ओस की एक बूंद का इंतज़ार ,
दाना ले जाती चींटी को अपने गंतव्य का इंतज़ार ,
एक अनाथ बच्चे को वात्सल्य भरे स्पर्श का इंतज़ार ,
विदीर्ण कुटुंब को अपनों के साथ का इंतज़ार ,
निष्क्रिय हुई भावनाओं को प्रेरणा के संचार का इंतज़ार ,
काली रात के अंधियारे को स्वर्णिम प्रकाश का इंतज़ार ,
निशब्द मानवता को मुखर होने के आभास का इंतज़ार ,
चहूं ओर दृष्टि डालकर तो देखो एक बार ,
समस्त सृष्टि को किसी ना किसी का इंतज़ार ,
इंतज़ार , इंतज़ार , इंतज़ार ,

कभी ना खत्म होने वाला इंतज़ार ।।

“Forgiveness”

“Samvatsari” the festival of forgiveness in Jain community was celebrated yesterday in a serene way .
To forgive is to ” Pass over a mistake” . We believe and practice that ‘ If we have hurt anybody by our words , actions and deeds anyhow knowingly or unknowingly then kindly forgive us on the auspicious day of ‘ Samvatsari ‘.’ In simple words we say sorry to each other whole heartedly . All the religions across the world tend to practice the same in the form of Holi , Eid -ul – fitar , Guru purab and Christmas .

This doesn’t mean we should wait for this day to admit guilt rather if we have done something wrong to anybody we should apologize then and there itself . Jain stipulation is that no private quarrel and dispute may be carried beyond samvatsari .
I personally believe and practice to apologize with the person who I am estrangent with . Life is too short and we should always spread happiness and love .

कुछ पंक्तियां हिंदी में कहना चाहूंगी ….

गलती किससे नहीं होती , ठोकर कौन नहीं खाता , लेकिन गलती को महसूस करके पश्चाताप व्यक्त करना क्षमा मांग लेना अति महत्वपूर्ण है । हम और आप अनंत – अनंत जीवन यात्रा करने निकले हैं , इस यात्रा में कई साथी , कई सहपाठी हैं । कभी कोई आगे , कभी कोई पीछे । यह यात्रा चलती ही रहती है कभी कुछ बोला – चाली हो गई हो , कभी मनमुटाव हो गया हो तो क्षमा करें और क्षमा मांग लें , मानव मन है यह सब हो जाना सहज है । कहा भी गया है ,


‘ क्षमा वीरस्य भूषणम् ‘

12345क्षमा वीर का भूषण है ,जीत है इसमें हार नहीं ,हाथ जोड़ और मान मोड़कर ,क्षमा मांगना ,यह कायर का व्यवहार नहीं ।।

If I have hurt you with my posts and comments knowingly or unknowingly so with folded hands 🙏 I seek forgiveness from my fellow bloggers and readers .

“डर लगता है”

अंधेरा हमसाया है मेरा ,
उजाले से अब डर लगता है ।
भूख नहीं डराती अब ,
निवाले से ही डर लगता है ।
फूंक – फूंक क्या कदम रखूं ,
चलने से ही डर लगता है ।
चोरों से क्या डरना अब ,
रख वालों से डर लगता है ।
धोखे , वफा की क्या चर्चा करूं ,
किसी के साथ से डर लगता है ।
फटकार से क्या डरना यारों ,
प्यार से अब तो डर लगता है ।
बेगानों को क्या दोष देना ,
अपनों से ही डर लगता है ।
किस्मत को क्या कोसूं अब ,
सुख – सुविधा से डर लगता है ।
बद्दुआ कोई क्या देगा ,
दुआओं से भी डर लगता है ।
राज किसी का भी हो यारों ,
माहौल से ही डर लगता है ।
पंखों की कोई इच्छा नहीं अब ,
उड़ने से ही डर लगता है ।
रिश्तेदारी क्या निभाऊं ,
रिश्तो से अब डर लगता है ।
जगमगाती रोशनी में ,
मन के अंधेरों से डर लगता है ।
अंधेरा हमसाया है मेरा ,
उजालों से अब डर लगता है ।।

Posted byBeingcreativePosted inUncategorizedTags:कविताडर6 Commentson ” डर लगता है “

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